यह लेख किसी धर्म या आस्थावान व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं लिखा गया है। यह केवल उन लोगों के लिए है जो जीवन, ब्रह्मांड और अस्तित्व के बड़े सवालों पर खुल कर, बिना डर के और बिना पूर्वाग्रह के सोचना चाहते हैं। ये प्रश्न सदियों से दार्शनिक, वैज्ञानिक और साधक सोचते आए हैं। इन्हें उठाना आस्था का अपमान नहीं, बल्कि सत्य की खोज का एक ईमानदार रास्ता है।
- ब्रह्मांड अरबों वर्ष पुराना है। क्या यह संभव है कि मानव इतिहास के बहुत बाद में ही धर्म और पैगंबर आए? यह समय-काल क्यों चुना गया?
- अगर ईश्वर पूरी तरह दयालु है, तो उसने मनुष्य में गलत चुनाव करने की स्वतंत्रता क्यों रखी? क्या प्रेम और स्वतंत्रता में कोई गहरा संबंध है?
- जन्म से ही कुछ लोग सुख-सुविधाओं में, कुछ अत्यंत कष्ट में पैदा होते हैं। क्या इसे ईश्वर की समान दृष्टि और न्याय के साथ समझा जा सकता है?
- मृत्यु के बाद के जीवन का अब तक कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला। क्या आस्था और विज्ञान के बीच यह अंतर हमेशा रहेगा?
- पवित्र ग्रंथों में समय के साथ संशोधन, अनुवाद और व्याख्याएँ हुई हैं। क्या यह दिव्यता की बजाय मानवीय प्रक्रिया को दर्शाता है?
- अगर ईश्वर को भविष्य का पूर्ण ज्ञान है, तो हमारी प्रार्थना उसकी योजना को कैसे बदल सकती है? क्या प्रार्थना का असली लाभ मन की शांति में है?
- सत्य एक होना चाहिए, फिर दुनिया में हजारों परस्पर-विरोधी धर्म और मत क्यों हैं? क्या सत्य की खोज व्यक्तिगत यात्रा है?
- नैतिकता क्या पहले से मनुष्य में थी, या उसे धर्म ने सिखाया? क्या बिना धार्मिक ग्रंथों के भी इंसान अच्छाई-बुराई समझ सकता है?
- अगर ईश्वर सर्वज्ञ है, तो वह पहले से जानता है कि कौन पास होगा और कौन फेल। फिर जीवन को “परीक्षा” बनाने की आवश्यकता क्यों?
- सर्वशक्तिमान होने का प्रसिद्ध दार्शनिक प्रश्न: क्या ईश्वर ऐसा पत्थर बना सकता है जो वह स्वयं न उठा सके? यह प्रश्न हमें “सर्वशक्तिमान” शब्द की सीमा पर सोचने को मजबूर करता है।
- अगर पवित्र ग्रंथ ईश्वरीय हैं, तो उनमें आज ज्ञात वैज्ञानिक सत्य (पृथ्वी का गोल होना, सूक्ष्मजीव, डीएनए, ब्रह्मांड की आयु आदि) पहले से स्पष्ट क्यों नहीं मिलते?
- दुनिया में भुखमरी, युद्ध, बलात्कार, प्राकृतिक आपदाएँ होती हैं। क्या ये सब किसी बड़ी “दिव्य योजना” का हिस्सा हैं, या ये केवल प्राकृतिक और मानवीय प्रक्रियाएँ हैं?
- प्रार्थना करने वाले अमीर और अमीर होते जाते हैं, गरीब और गरीब। क्या प्रार्थना का प्रभाव मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक है?
- अधिकांश लोगों का धर्म जन्म के देश और परिवार से तय होता है। क्या यह बताता है कि धर्म आस्था से अधिक संस्कृति और भूगोल का विषय है?
- छोटे बच्चे बिना कोई कर्म किए मर जाते हैं। स्वर्ग-नरक के सिद्धांत में उनका स्थान कैसे तय होता है?
- एक सर्वपूर्ण, सर्वशक्तिमान और प्रेममय सत्ता को हमारी पूजा, प्रशंसा और भेंट की आवश्यकता क्यों होती है?
- सभी धर्म शांति की बात करते हैं, फिर भी इतिहास में सबसे अधिक युद्ध धर्म के नाम पर हुए। क्या धर्म स्वभाव से जोड़ता है या विभाजन का कारण बनता है?
- मुक्त इच्छा और पूर्वनिर्धारित नियति – दोनों एक साथ कैसे सही हो सकते हैं? यह विरोधाभास सदियों से दार्शनिकों को सोचने पर मजबूर करता है।
- अगर ईश्वर एक है और सत्य एक है, तो इतने सारे परस्पर-विरोधी ग्रंथ, देवता और मत क्यों?
- अगर ईश्वर दयालु और सर्वशक्तिमान है, तो वह आज भी स्पष्ट रूप से क्यों प्रकट नहीं होता? उसकी मौनता को हम कैसे समझें?
- पुनर्जन्म में पिछले जन्म की स्मृति क्यों मिट जाती है? बिना स्मृति के कर्मों का न्याय कैसे पूर्ण कहा जा सकता है?
- ब्रह्मांड बनाने से पहले ईश्वर कहाँ था? समय और स्थान से परे होने का अर्थ क्या है?
- बुराई और पाप की उत्पत्ति किसने की? अगर ईश्वर ने सब बनाया, तो क्या बुराई भी उसी की रचना है?
- कुछ लोग जन्म से स्वस्थ, धनवान और सुरक्षित, कुछ विपरीत परिस्थितियों में। क्या इसे पूर्ण न्याय और प्रेम कहा जा सकता है?
- सत्य अगर सार्वभौमिक है, तो वह भारत में हिन्दू रूप में, अरब में इस्लाम रूप में, तिब्बत में बौद्ध रूप में क्यों प्रकट हुआ?
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