ऑंटोनॉमी: एक दार्शनिक अवधारणा का विस्तृत परिचय

नमस्ते! आज हम एक दुर्लभ और गहन दार्शनिक शब्द ऑंटोनॉमी (Ontonamy) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। यह शब्द मुख्य रूप से स्पेनिश दार्शनिक और धर्मशास्त्री रायमोन पैनिकर (Raimon Panikkar, 1918-2010) की रचनाओं से जुड़ा हुआ है। पैनिकर एक अंतरधार्मिक संवाद के प्रबल समर्थक थे, जिन्होंने ईसाई, हिंदू और अन्य परंपराओं को जोड़ने का प्रयास किया। उनका जन्म बार्सिलोना में एक कैथोलिक मां और हिंदू पिता के घर हुआ था, जिसने उनकी सोच को अंतरसांस्कृतिक बनाया।

ऑंटोनॉमी शब्द की उत्पत्ति और अर्थ

  • व्युत्पत्ति: यह ग्रीक शब्दों से बना है – ऑन (on) अर्थात् “होना” या “सत्ता” (being) और नॉमॉस (nomos) अर्थात् “नियम” या “कानून” (law)। इसलिए, शाब्दिक अर्थ है “सत्ता का नियम” या “होने का अपना कानून”
  • पैनिकर के अनुसार, ऑंटोनॉमी एक ऐसी स्थिति है जहां किसी अस्तित्व (being) का नियम उसके अपने स्वभाव से नहीं, बल्कि पूरे वास्तविकता (reality) के साथ उसके आंतरिक संबंध से उत्पन्न होता है। यह न तो पूर्ण स्वतंत्रता है और न ही बाहरी अधीनता।

ऑंटोनॉमी की तुलना स्वायत्तता और परायत्तता से

पैनिकर ने मानव अस्तित्व और नैतिकता की तीन संभावित स्थितियों का वर्णन किया है:

  1. स्वायत्तता (Autonomy):
    • अर्थ: स्व-नियम (self-law)।
    • व्यक्ति या अस्तित्व खुद अपने नियम बनाता है। बाहरी किसी भी नियम को अस्वीकार करता है।
    • उदाहरण: आधुनिक पश्चिमी विचारधारा में व्यक्तिवाद, जहां व्यक्ति पूर्णतया स्वतंत्र होता है।
    • कमी: यह अलगाव पैदा करता है, क्योंकि व्यक्ति को ब्रह्मांड से अलग मानता है।
  2. परायत्तता (Heteronomy):
    • अर्थ: पर-नियम (other-law)।
    • नियम बाहरी स्रोत से आते हैं, जैसे ईश्वर, समाज या कानून।
    • उदाहरण: पारंपरिक धार्मिक समाजों में, जहां व्यक्ति बाहरी अधिकार (जैसे धर्मग्रंथ या राजा) के अधीन होता है।
    • कमी: यह व्यक्ति की अपनी गरिमा और स्वतंत्रता को दबाता है।
  3. ऑंटोनॉमी (Ontonamy):
    • अर्थ: सत्ता-नियम (law of being)।
    • यहां नियम न तो केवल स्वयं से आता है और न ही केवल बाहर से, बल्कि अस्तित्व की गहन एकता से। व्यक्ति पूरे ब्रह्मांड (cosmos), दिव्य (divine) और मानव (human) के साथ जुड़ा हुआ है।
    • पैनिकर इसे कॉस्मोथियैंड्रिक (cosmotheandric) दृष्टि से जोड़ते हैं: वास्तविकता तीन आयामों – ब्रह्मांडीय (cosmic), दिव्य (theandric) और मानवीय (anthropic) – की अविभाज्य एकता है।
    • यह एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन है, जहां व्यक्ति अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए पूरे के साथ एक हो जाता है। यह अद्वैत (non-dualism) की भारतीय अवधारणा से प्रेरित है।

पैनिकर के विचार में ऑंटोनॉमी का महत्व

  • पैनिकर का मानना था कि आधुनिक विश्व स्वायत्तता की अतिवादिता से पीड़ित है, जो अलगाव और संकट पैदा करती है। वहीं पारंपरिक परायत्तता दमनकारी हो सकती है।
  • ऑंटोनॉमी एक “तीसरा मार्ग” है, जो अंतरधार्मिक और अंतरसांस्कृतिक संवाद के लिए आवश्यक है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची स्वतंत्रता अलगाव में नहीं, बल्कि संबंधों की गहनता में है।
  • उनकी पुस्तकों जैसे The Cosmotheandric Experience और गिफोर्ड व्याख्यानों (The Rhythm of Being) में यह अवधारणा विस्तार से वर्णित है।
  • भारतीय दर्शन से प्रेरणा: पैनिकर अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य) और अन्य पूर्वी विचारों से प्रभावित थे, जहां व्यक्ति और ब्रह्म एक हैं, लेकिन अलगाव भी नहीं।

उदाहरण से समझें

  • कल्पना कीजिए एक पेड़ को:
    • स्वायत्तता में पेड़ खुद को अलग मानकर मिट्टी से पानी न ले।
    • परायत्तता में पेड़ केवल मिट्टी के नियमों का गुलाम बने।
    • ऑंटोनॉमी में पेड़ अपनी विशिष्टता (पत्ते, फल) रखते हुए मिट्टी, सूर्य और पूरे पर्यावरण के साथ एक होकर बढ़ता है। उसका “नियम” उसके होने की प्रकृति से ही निकलता है।

निष्कर्ष

ऑंटोनॉमी आज के विश्व में बहुत प्रासंगिक है, जहां व्यक्तिवाद और सामूहिकता के बीच संतुलन की जरूरत है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची मुक्ति अलगाव में नहीं, बल्कि एकता और संबंधों में है। पैनिकर की यह अवधारणा हमें पर्यावरण, धर्म और मानव अधिकारों के मुद्दों पर नया दृष्टिकोण देती है।

यदि आप इस पर और गहराई से जानना चाहें, जैसे पैनिकर की कोई विशेष पुस्तक या तुलनात्मक उदाहरण, तो बताएं!

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