प्राचीन काल में जब न तो आधुनिक कम्पास थे, न GPS और न ही उपग्रह, तब भी मानव सटीक दिशा-ज्ञान और खगोलीय गणनाओं में आश्चर्यजनक रूप से निपुण था। यह केवल अनुभव नहीं, बल्कि प्राचीन खगोल विज्ञान (Ancient Astronomy) पर आधारित एक गहन वैज्ञानिक समझ का परिणाम था।
1. प्राचीन खगोल विज्ञान क्या है?
प्राचीन खगोल विज्ञान वह विद्या है जिसमें सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और नक्षत्रों की गति का अध्ययन किया जाता था। भारत, मिस्र, मेसोपोटामिया, चीन और माया सभ्यता में खगोल विज्ञान का अत्यंत विकसित रूप देखने को मिलता है।
भारत में आर्यभट्ट, वराहमिहिर और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने ग्रहों की गति, ग्रहण और समय-गणना पर सटीक सिद्धांत दिए।
2. बिना कम्पास के दिशाएँ जानने की विधियाँ
(क) सूर्य द्वारा दिशा ज्ञान
- सूर्योदय पूर्व दिशा में और सूर्यास्त पश्चिम में होता है।
- दोपहर में सूर्य लगभग दक्षिण दिशा में होता है (भारत के संदर्भ में)।
- छाया की लंबाई और दिशा से उत्तर-दक्षिण रेखा तय की जाती थी।
👉 शंकु-यंत्र (Gnomon) इसी सिद्धांत पर आधारित था।
(ख) ध्रुव तारा (Polaris) द्वारा उत्तर दिशा
- ध्रुव तारा हमेशा उत्तर दिशा को दर्शाता है।
- सप्तऋषि मंडल (Big Dipper) की सहायता से ध्रुव तारे की पहचान की जाती थी।
- समुद्री यात्रियों और रेगिस्तान के यात्रियों के लिए यह सबसे भरोसेमंद तरीका था।
(ग) चंद्रमा और नक्षत्रों का प्रयोग
- चंद्रमा की कलाएँ (तिथियाँ) और उसकी गति दिशा निर्धारण में सहायक थीं।
- नक्षत्रों की स्थिति से ऋतु, समय और दिशा का ज्ञान होता था।
3. मंदिर और वास्तुकला में खगोल विज्ञान
भारत के अनेक प्राचीन मंदिर खगोलीय सिद्धांतों पर निर्मित हैं:
- कोणार्क सूर्य मंदिर – सूर्य की किरणें गर्भगृह में प्रवेश करती थीं।
- बृहदेश्वर मंदिर – छाया गणना और दिशाओं की सटीकता।
- मंदिरों का पूर्वाभिमुख होना खगोलीय और वैज्ञानिक कारणों पर आधारित है।
4. समुद्री और स्थल यात्राओं में दिशा ज्ञान
प्राचीन नाविक:
- हवा की दिशा
- लहरों की गति
- पक्षियों की उड़ान
- तारों की स्थिति
इन सभी का प्रयोग कर हजारों किलोमीटर की यात्राएँ करते थे।
5. क्या यह केवल आस्था थी?
नहीं। यह अनुभव + अवलोकन + गणना का विज्ञान था।
आधुनिक विज्ञान इन्हीं सिद्धांतों को नए उपकरणों के साथ प्रयोग करता है।
प्राचीन खगोल विज्ञान और बिना कम्पास के दिशा-ज्ञान यह सिद्ध करता है कि हमारे पूर्वज वैज्ञानिक सोच, गणितीय समझ और प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन में अत्यंत उन्नत थे। यह ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था।
“आधुनिक विज्ञान, प्राचीन ज्ञान की ही विकसित अवस्था है।”
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