आज हम थर्मोडायनेमिक्स के दो सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन करने वाले कॉन्सेप्ट्स की बात करेंगे – एंट्रॉपी (Entropy) और एन्थैल्पी (Enthalpy)। इन दोनों को समझने के बाद आपको लगेगा कि अरे यार, ये तो बहुत सिंपल थे!
पहले मिलते हैं एन्थैल्पी से (H = Enthalpy)
कल्पना कीजिए आपके पास एक बॉक्स है जिसमें गैस भरी हुई है। अब आप इस गैस को गर्म करते हैं, दबाव डालते हैं, या कोई रासायनिक रिएक्शन करते हैं। इस सारी प्रक्रिया में जो ऊर्जा अंदर-बाहर होती है, उसका पूरा हिसाब रखना मुश्किल होता है।
तो वैज्ञानिकों ने कहा – “चलो एक नई क्वांटिटी बना देते हैं जो हमें पूरा एनर्जी अकाउंट एक साथ दे दे!”
उसका नाम पड़ा एन्थैल्पी (H) फॉर्मूला: H = U + PV यानी आंतरिक ऊर्जा (U) + दबाव × आयतन (PV)
सरल शब्दों में: एन्थैल्पी वो टोटल हीट एनर्जी है जो किसी सिस्टम में स्थिर दबाव (constant pressure) पर छिपी हुई है।
उदाहरण: जब आप कोई ईंधन जलाते हैं (जैसे LPG), तो जो गर्मी निकलती है वो एन्थैल्पी ऑफ कॉम्बस्शन होती है। इसी से हम कहते हैं कि “इस गैस की कैलोरी वैल्यू इतनी है”।
याद रखने की ट्रिक: एन्थैल्पी = “हीट कंटेंट” (लगभग!) ज्यादातर रासायनिक रिएक्शन्स constant pressure पर होते हैं → इसलिए केमिस्ट्री में एन्थैल्पी (ΔH) बहुत काम आती है। अगर ΔH नेगेटिव → एक्सोथर्मिक रिएक्शन (गर्मी निकलती है) अगर ΔH पॉजिटिव → एंडोथर्मिक रिएक्शन (गर्मी सोखता है)
अब आती है एंट्रॉपी (S = Entropy)
ये कॉन्सेप्ट थोड़ा फिलोसॉफिकल है, लेकिन बहुत सुंदर है।
एंट्रॉपी को सबसे अच्छे से ऐसे समझाया जाता है: “एंट्रॉपी प्रकृति में बेतरतीबी (disorder) या यादृच्छिकता (randomness) का माप है”
उदाहरण से समझिए:
- आपका कमरा साफ-सुथरा है → कम एंट्रॉपी एक हफ्ते बाद कपड़े इधर-उधर, किताबें बिखरी → एंट्रॉपी बढ़ गई!
- बर्फ → बहुत ऑर्डर्ड स्ट्रक्चर → कम एंट्रॉपी पिघलकर पानी → ज्यादा रैंडम → एंट्रॉपी बढ़ गई उबलकर भाप → और भी ज्यादा रैंडम → एंट्रॉपी और बढ़ गई
दूसरा थर्मोडायनेमिक्स नियम कहता है: “ब्रह्मांड की कुल एंट्रॉपी हमेशा बढ़ती रहती है” यानी ब्रह्मांड धीरे-धीरे और “अव्यवस्थित” होता जा रहा है!
याद रखने की ट्रिक: Entropy = “एन्ट्रोपी” → “एन्ट्रोपी” सुनकर लगता है “अंदर टोपी” → सब कुछ उल्टा-पुल्टा, बिखरा हुआ! या S → Scattered (बिखरा हुआ)
अब सबसे बड़ा सवाल – स्पॉन्टेनियस प्रोसेस कब होती है?
कोई प्रोसेस अपने आप होगी या नहीं, ये सिर्फ एन्थैल्पी से नहीं पता चलता। उसके लिए गिब्स फ्री एनर्जी (G) का कॉन्सेप्ट आता है:
ΔG = ΔH – TΔS
अर्थात: अपने आप होने वाली प्रोसेस के लिए → ΔG < 0 होना चाहिए
मतलब दो चीजें मायने रखती हैं:
- ΔH नेगेटिव हो (ऊर्जा निकले) → फायदे में
- ΔS पॉजिटिव हो (बेतरतीबी बढ़े) → प्रकृति को पसंद है
उदाहरण: बर्फ अपने आप 0°C से ऊपर पिघलती है → ΔH पॉजिटिव (हीट सोखती है), लेकिन ΔS बहुत ज्यादा पॉजिटिव (सॉलिड → लिक्विड) → इसलिए TΔS > ΔH → ΔG नेगेटिव → अपने आप पिघलती है!
सारांश (एक लाइन में)
- एन्थैल्पी (H) → बताती है कि रिएक्शन में कितनी गर्मी निकलेगी या सोखी जाएगी (constant pressure पर)
- एंट्रॉपी (S) → बताती है कि सिस्टम कितना “बिखरा हुआ” या अव्यवस्थित है
- प्रकृति को दो चीजें पसंद हैं: ऊर्जा कम होना और बेतरतीबी बढ़ना!
अगली बार जब कोई कहे “यार एंट्रॉपी समझ नहीं आती”, तो आप उसे कमरे की सफाई का उदाहरण दे देना!
कमेंट में बताइए आपको कौन सा कॉन्सेप्ट सबसे मजेदार लगा – एन्थैल्पी की गर्मी या एंट्रॉपी की बेतरतीबी?
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