Justice प्रकृति का नियम नहीं — इंसानों का आविष्कार है

1. क्या प्रकृति में “Justice” होता है?

नहीं — प्रकृति में Justice जैसा कोई नैतिक नियम नहीं होता।
प्रकृति में सिर्फ कारण और परिणाम (cause & effect) होते हैं।

  • शेर हिरन को मारता है = यह “अन्याय” नहीं
  • सूखा पड़ता है = यह “सज़ा” नहीं
  • किसी का जन्म अमीर या गरीब घर में होना = यह “न्याय-अन्याय” नहीं

प्रकृति सिर्फ नियमों पर चलती है:

  • गुरुत्वाकर्षण
  • जैविक विकास (evolution)
  • मौसम
  • भूगर्भीय प्रक्रियाएँ

इनमें कोई “नैतिकता” (morality) या “न्याय” (fairness) नहीं है।


2. फिर Justice का कॉन्सेप्ट किसने बनाया?

➡️ Justice पूरी तरह मनुष्य की बनाई हुई अवधारणा है।
इंसानों ने इसे इसलिए बनाया क्योंकि:

🔹 A. इंसान समाज में रहते हैं

समाज में बिना नियमों के अराजकता (chaos) होती।
इसलिए न्याय की जरूरत पड़ी।

🔹 B. इंसानों में सहानुभूति (empathy) और नैतिकता (morality)

इंसान समझता है कि किसी को चोट पहुँचाना गलत है → इसलिए न्याय का विचार पैदा हुआ।

🔹 C. खतरे को कम करने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए

अगर नियम न हों तो:

  • हत्या
  • चोरी
  • शोषण
  • धोखा

सब सामान्य हो जाएँ। Justice समाज की सुरक्षा के लिए बनाया गया।


3. प्रकृति vs मानव न्याय का अंतर

प्रकृतिमानव न्याय
अमानवीय, भावनाहीननैतिकता और भावनाओं पर आधारित
सिर्फ नियम (gravity, evolution)कानून, संविधान, कोर्ट
कोई “सही-गलत” नहींसही-गलत का मूल्यांकन
कोई सज़ा नहीं, सिर्फ परिणामअपराध के लिए सज़ा

🎯 4. फिर लोग कहते क्यों हैं “Nature has justice”?

यह एक मानवीय भ्रम (moral illusion) है।
लोग सोचते हैं कि:

  • “किसी के साथ बुरा हुआ, तो प्रकृति ने सज़ा दी”
  • “जो करेगा, वही भरेगा”
  • “कर्म फल देगा”

यह मूल रूप से मानव मन का pattern-seeking behavior है, लेकिन प्रकृति के पास कोई नैतिक एजेंडा नहीं


⭐ निष्कर्ष

Justice एक human-made concept है।
प्रकृति में केवल नियम हैं, न्याय नहीं।
इंसानों ने Justice बनाया ताकि समाज चले, लोग सुरक्षित रहें और सही-गलत पर सहमति बन सके।

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