आजकल सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार घूमता रहता है – “पाप-पुण्य, जाति, धर्म, स्वर्ग, नरक ये सब सच हैं या सिर्फ डराने-बहकाने की कहानियाँ?” कुछ लोग कहते हैं कि ये सब विज्ञान के युग में बेकार की बातें हैं। कुछ लोग आज भी इन्हें अपनी जिंदगी का आधार मानते हैं। तो चलिए, बिना किसी पक्षपात के, बिना किसी को ठेस पहुँचाए, इस विषय को खुलकर समझते हैं।
१. ये विचार कहाँ से आए?
मानव सभ्यता के शुरू से ही दो सवाल इंसान को परेशान करते आए हैं:
- मैं यहाँ क्यों हूँ?
- मरने के बाद क्या होगा?
इन सवालों के जवाब देने के लिए हर सभ्यता ने अपनी-अपनी कहानियाँ गढ़ीं। मिस्र में फिरौन को अगले जीवन के लिए सोना-चाँदी साथ दफनाया जाता था। ग्रीक लोग हेडीज़ और एलिज़ियम की बात करते थे। भारत में वेद-उपनिषद से लेकर पुराणों तक कर्मफल, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक का पूरा सिस्टम बना।
यानी ये विचार “ईश्वर ने उतारे” इससे पहले भी थे। ये इंसानी दिमाग की उपज हैं जो समाज को व्यवस्थित रखने के लिए बनाए गए।
२. इनका समाजशास्त्रीय काम क्या है?
कल्पना कीजिए ३००० साल पहले का गाँव। कोई पुलिस नहीं, कोई कोर्ट नहीं, कोई सीसीटीवी नहीं। अब अगर कोई चोरी करे, बलात्कार करे, हत्या करे तो उसे रोकने का सबसे सस्ता और कारगर तरीका क्या है?
“देख भाई, यहाँ कोई न देखे तो भी ऊपर वाला देख रहा है। मरने के बाद नरक में तेल के कड़ाह में तलेगा।” यह डर इतना गहरा था कि अधिकांश लोग सचमुच डर जाते थे।
इसी तरह पुण्य का लालच: “दान करो, अच्छा करो, मरने के बाद स्वर्ग में अप्सराएँ मिलेंगी।” नतीजा? समाज में एक न्यूनतम नैतिकता बनी रही।
जाति-व्यवस्था भी शुरू में शायद श्रम-विभाजन थी, बाद में जन्म से तय होने लगी ताकि व्यवस्था बनी रहे। यानी ये सारे कॉन्सेप्ट समाज को कंट्रोल करने के बहुत पुराने और बहुत कामयाब टूल्स हैं।
३. क्या ये सचमुच “होते” हैं?
अब असली सवाल।
विज्ञान की नजर से देखें तो:
- मृत्यु के बाद चेतना का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला।
- नियर-डेथ एक्सपीरियंस को मेडिकल साइंस दिमाग में ऑक्सीजन की कमी और डोपामाइन-एंडॉर्फिन के रश से समझाता है।
- स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म की कोई प्रयोगशाला में पुनरावृत्ति नहीं हुई।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ये “झूठ” हैं। ये “सच” भी नहीं हैं जिस तरह गुरुत्वाकर्षण सच है। ये “उपकरण” हैं। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक उपकरण।
जैसे ट्रैफिक सिग्नल लाल है तो रुकना पड़ता है, भले ही सिग्नल कोई “ईश्वरीय” चीज न हो। वैसे ही पाप-पुण्य का कॉन्सेप्ट भी एक सामाजिक सिग्नल है।
४. आज के समय में इनकी जरूरत है या नहीं?
आज हमारे पास कानून है, पुलिस है, जेल है, कैमरा है। तो क्या अब ये पुरानी कहानियाँ छोड़ देनी चाहिए?
दो तरह के लोग हैं:
एक पक्ष: “हाँ, छोड़ दो। ये अंधविश्वास हैं, जातिवाद फैलाते हैं, लोगों को बाँटते हैं।”
दूसरा पक्ष: “नहीं, कानून बाहर से डराता है, धर्म अंदर से डराता है। आज भी लाखों लोग सिर्फ़ कानून के डर से नहीं, बल्कि पाप के डर से गलत काम नहीं करते।”
मेरा अपना विचार: जब तक इंसान के भीतर स्वयं का विवेक पूरी तरह जागृत नहीं हो जाता, तब तक नैतिकता के बाहरी सहारे (चाहे धर्म हो या कानून) जरूरी रहेंगे। लेकिन जैसे-जैसे शिक्षा, जागरूकता और आर्थिक समानता बढ़ेगी, ये सहारे खुद-ब-खुद कमजोर पड़ते जाएँगे।
५. तो अंत में जवाब क्या है?
पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, जाति-धर्म – ये न पूरी तरह सच हैं, न पूरी तरह झूठ। ये इंसान द्वारा इंसान के लिए बनाई गई कहानियाँ हैं जो हजारों साल तक समाज को जोड़े रखने में कामयाब रहीं।
आज तुम इन पर विश्वास करो या न करो, इससे कोई स्वर्ग-नरक नहीं बदलने वाला (क्योंकि शायद है ही नहीं)। लेकिन यह जरूर बदल सकता है कि तुम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हो।
अगर बिना स्वर्ग-नरक के डर के भी तुम अच्छे इंसान बन सकते हो, तो बहुत बढ़िया। अगर इसके लिए थोड़ा डर चाहिए, तो भी कोई बुराई नहीं।
बस इतना याद रखो: अगर स्वर्ग-नरक सच भी हुए, तो भी वहाँ का टिकट यहाँ के कर्म से ही कटेगा। और अगर ये सब कल्पना भी हुए, तो भी अच्छा इंसान बनकर तुमने यहाँ की जिंदगी तो अच्छी कर ही ली।
दोनों तरह से फायदा तुम्हारा। नुकसान किसी का नहीं।
तो चाहे मानो या न मानो – बस अच्छे इंसान बनो। बाकी सब तो कहानियाँ हैं। बहुत सुंदर कहानियाँ।
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